0 समान नागरिक संहिता यूसीसी महाराष्ट्र में होगा लागू? समिति ने १५ नवम्बर तक ३७सवालों पर मांगे १५ नवम्बर तक सुझाव/ इस बार शीतकालीन सत्र में पेश होगा यूसीसी प्रस्ताव - Khabre Mumbai

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समान नागरिक संहिता यूसीसी महाराष्ट्र में होगा लागू? समिति ने १५ नवम्बर तक ३७सवालों पर मांगे १५ नवम्बर तक सुझाव/ इस बार शीतकालीन सत्र में पेश होगा यूसीसी प्रस्ताव

महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता पर मंथन: लिव-इन रिलेशनशिप और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों पर विशेष जोर

नागपुर के शीतकालीन सत्र में UCC विधेयक पेश करने की तैयारी, महाराष्ट्र सरकार की समिति ने जनता से मांगे सुझाव

मुंबई: महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code—UCC) लागू करने की दिशा में राज्य सरकार ने पहल तेज कर दी है। इस संबंध में गठित सात सदस्यीय प्रारूप समिति ने आम नागरिकों से विभिन्न सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर राय मांगी है। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना देसाई कर रही हैं। समिति ने अपनी वेबसाइट पर 37 सवालों की एक प्रश्नावली जारी की है, जिसके माध्यम से नागरिकों से नवंबर के मध्य तक अपने विचार और सुझाव देने की अपील की गई है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि राज्य सरकार वर्ष के अंत में नागपुर में होने वाले विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान समान नागरिक संहिता से संबंधित विधेयक पेश करेगी।

उत्तराखंड की तुलना में महाराष्ट्र का प्रस्ताव कम सख्त हो सकता है

प्रस्तावित समान नागरिक संहिता में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, महिलाओं के संपत्ति अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार किया जा रहा है। समिति का उद्देश्य राज्य की सामाजिक परिस्थितियों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए संभावित कानूनी प्रावधानों पर जनता की राय जानना है।

प्रश्नावली में यह भी पूछा गया है कि क्या समान नागरिक संहिता लागू करना वर्तमान समय में आवश्यक है। इसके साथ ही यह जानने का प्रयास किया गया है कि क्या इस तरह की संहिता को धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन किए बिना लागू किया जा सकता है तथा क्या इससे कानूनी विवादों में कमी आएगी और न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सकेगी।


विवाह की न्यूनतम आयु और बहुविवाह पर सवाल

समिति ने पुरुषों और महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु निर्धारित करने के संबंध में भी सुझाव मांगे हैं। प्रश्नावली में 18, 21 और 24 से 27 वर्ष जैसी विभिन्न आयु-सीमाओं पर राय मांगी गई है।

इसके अतिरिक्त, बहुविवाह पर रोक और विवाह से जुड़े अन्य व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता लाने के विषय पर भी विचार किया जा रहा है। समिति यह जानना चाहती है कि विवाह संबंधी नियमों में समानता किस प्रकार सुनिश्चित की जा सकती है।

लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण होगा?

प्रस्तावित UCC के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर पूछे गए सवाल शामिल हैं। समिति ने नागरिकों से पूछा है कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप शुरू होने पर उसका अनिवार्य पंजीकरण होना चाहिए। साथ ही, ऐसे संबंध समाप्त होने पर भी पंजीकरण या औपचारिक सूचना देना आवश्यक बनाया जाना चाहिए या नहीं, इस पर सुझाव मांगे गए हैं।

समिति यह भी विचार कर रही है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को विवाह करने वाले दंपतियों के समान भरण-पोषण, विरासत और देखभाल जैसे कानूनी संरक्षण दिए जाने चाहिए या नहीं।

इन सवालों का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने के संभावित उपायों पर विचार करना है।

निकाह हलाला और चचेरे-ममेरे रिश्तों में विवाह पर विचार

मुस्लिम समुदाय में प्रचलित कुछ विवाह संबंधी परंपराएं भी समिति की प्रश्नावली का हिस्सा हैं। इसमें निकाह हलाला से संबंधित प्रावधानों और तलाकशुदा पति-पत्नी के दोबारा विवाह से जुड़े नियमों पर राय मांगी गई है।

समिति ने यह भी पूछा है कि क्या विवाह के लिए प्रतिबंधित रिश्तों की एक समान सूची निर्धारित की जानी चाहिए। इस सवाल का संबंध विशेष रूप से उन समुदायों में प्रचलित चचेरे-ममेरे या अन्य रिश्तेदारों के बीच विवाह की परंपराओं से है, जहां ऐसे विवाह सामाजिक रूप से स्वीकार्य हैं।

इस मुद्दे पर किसी भी प्रस्तावित प्रावधान को लागू करने से पहले धार्मिक परंपराओं, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण होगा।

उत्तराधिकार कानून में एकरूपता पर जोर

संपत्ति के उत्तराधिकार का मुद्दा भी समिति के प्रमुख विचार-विषयों में शामिल है। प्रश्नावली में पूछा गया है कि क्या वसीयत किए बिना किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसकी संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए सभी धर्मों में समान नियम होने चाहिए।

वर्तमान में विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत उत्तराधिकार के नियम अलग-अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, मुस्लिम उत्तराधिकार कानून के अंतर्गत सामान्य परिस्थितियों में बेटी का हिस्सा बेटे के हिस्से से अलग होता है। समिति इस विषय पर नागरिकों की राय जानना चाहती है कि क्या उत्तराधिकार के नियमों में एकरूपता होनी चाहिए।

इसके अलावा, नागरिकों को अपनी पूरी संपत्ति वसीयत के माध्यम से किसी भी व्यक्ति को देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए या इस अधिकार पर कुछ सीमाएं होनी चाहिए, इस पर भी सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।

कृषि भूमि और पैतृक घरों के लिए अलग कानून?

महाराष्ट्र की समिति ने कृषि भूमि और पैतृक घरों के उत्तराधिकार पर भी विशेष ध्यान दिया है। समिति यह जानना चाहती है कि क्या कृषि भूमि तथा पुश्तैनी मकानों के उत्तराधिकार के लिए अन्य संपत्तियों से अलग कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए।

ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवारों के लिए कृषि भूमि और पैतृक मकान आजीविका तथा पारिवारिक विरासत का प्रमुख आधार होते हैं। अनेक मामलों में कृषि भूमि परिवार के पुरुष सदस्य को हस्तांतरित की जाती है और पैतृक मकान भी उसी परिवार के साथ जुड़ा रहता है।

ऐसे में समिति यह विचार कर रही है कि क्या इन संपत्तियों के बंटवारे और उत्तराधिकार के लिए विशेष प्रावधान बनाए जाने चाहिए, ताकि महिलाओं के अधिकारों, पारिवारिक हितों और कृषि भूमि के स्वामित्व से जुड़े प्रश्नों पर स्पष्टता लाई जा सके।

महिलाओं के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन

प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के तहत महिलाओं के संपत्ति अधिकार, विवाह और तलाक से संबंधित नियम तथा लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले व्यक्तियों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण महत्वपूर्ण विषय बने हुए हैं।

समिति की प्रश्नावली से स्पष्ट है कि महाराष्ट्र सरकार केवल विवाह संबंधी नियमों तक सीमित न रहकर उत्तराधिकार, पारिवारिक संपत्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे व्यापक विषयों पर भी विचार करना चाहती है।

हालांकि, समिति के सवाल और जनता से मांगे गए सुझाव अभी विचार-विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इनसे किसी अंतिम कानूनी प्रावधान की पुष्टि नहीं होती। प्रस्तावित विधेयक का वास्तविक स्वरूप सरकार की अंतिम नीति, संवैधानिक प्रावधानों और विधायी प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।

निष्कर्ष: महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता को लेकर शुरू हुई यह प्रक्रिया विवाह, उत्तराधिकार और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानूनों में संभावित बदलावों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब यह देखना होगा कि जनता से मिले सुझावों के आधार पर समिति किस प्रकार की सिफारिशें करती है और राज्य सरकार शीतकालीन सत्र में विधेयक का कौन-सा स्वरूप प्रस्तुत करती है।

राज्य के मुखिया देवेंद्र फडणवीस ने इस बार समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का प्रस्ताव इस बार शीतकालीन सत्र में लाने की घोषणा पहले ही कर दी है।

इन 37 सवालों पर सुझाव के लिए 15 नवम्बर तक का समय निर्धारित किया गया है।


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