शारदीय नवरात्रि आज से शुरू, मा शैलपुत्री की होती है आज पूजा।
आज से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ, मां शैलपुत्री की आराधना से होगी नौ दिवसीय पर्व की शुरुआत
घटस्थापना के साथ घर-घर में होगी देवी की पूजा-अर्चना, सुख-समृद्धि और शक्ति प्राप्ति के लिए श्रद्धालु करेंगे उपवास
मुंबई। देशभर में आज से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। पर्व की शुरुआत घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ होती है। मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन तथा दुर्गा सप्तशती के पाठ की तैयारियां की जाती हैं।
घटस्थापना और पूजा का शुभ मुहूर्त
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना कर मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। हालांकि, घटस्थापना का सटीक मुहूर्त स्थानीय पंचांग, सूर्योदय और तिथि के अनुसार निर्धारित किया जाता है।
• प्रातःकाल शुभ मुहूर्त: सुबह 06:19 बजे से सुबह 10:12 बजे तक (अवधि: करीब 3 घंटे 52 मिनट)
• अभिजीत मुहूर्त (दोपहर): सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक (अवधि: 46 मिनट)
महत्वपूर्ण तिथि संबंधी सूचना: आज 11 अक्टूबर 2026 है। शारदीय नवरात्रि की शुरुआत सामान्यतः आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को होती है।
घटस्थापना के दौरान प्रातःकाल पूजा करना परंपरागत रूप से शुभ माना जाता है। यदि सुबह का मुहूर्त उपलब्ध न हो, तो स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित वैकल्पिक शुभ समय में पूजा की जा सकती है।
मां शैलपुत्री की पूजा का महत्व
मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। इनके नाम में ‘शैल’ का अर्थ पर्वत और ‘पुत्री’ का अर्थ बेटी है। मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल सुशोभित होता है। उनका वाहन वृषभ यानी बैल है, इसी कारण उन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है।
मां शैलपुत्री को प्रकृति, स्थिरता, शक्ति और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन उनकी पूजा करने से भक्तों को मानसिक शांति, आत्मबल और जीवन में दृढ़ता प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।
मां शैलपुत्री के प्रमुख मंत्र
नवरात्रि के पहले दिन श्रद्धालु मां शैलपुत्री के मंत्रों का जाप कर सकते हैं।
1. मां शैलपुत्री का बीज मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
2. मां शैलपुत्री का ध्यान मंत्र
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
3. मां शैलपुत्री का प्रार्थना मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
4. दुर्गा माता का सामान्य मंत्र
ॐ दुं दुर्गायै नमः॥
श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सुविधानुसार इन मंत्रों का 11, 21 या 108 बार जाप कर सकते हैं। मंत्र जाप के दौरान स्वच्छता, एकाग्रता और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
पूजा में किन सामग्रियों का होता है इस्तेमाल?
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा के लिए सामान्यतः निम्नलिखित सामग्री का उपयोग किया जाता है:
- मिट्टी का पात्र और जौ के बीज।
- जल से भरा कलश, आम या अशोक के पत्ते तथा नारियल।
- लाल या पीला कपड़ा, मौली और रोली।
- हल्दी, कुमकुम, अक्षत यानी साबुत चावल।
- लाल या सफेद फूल, फूलों की माला और दुर्वा जहां परंपरा के अनुसार अर्पित की जाती हो।
- धूप, दीपक, घी, कपूर और अगरबत्ती।
- फल, मिठाई, बताशे और घर में तैयार सात्त्विक नैवेद्य।
- मां शैलपुत्री को परंपरागत रूप से प्रिय माने जाने वाले सफेद पुष्प और सफेद रंग की मिठाइयां।
पूजा सामग्री क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। कलश स्थापना करते समय स्वच्छ स्थान का चयन करना और अग्नि से संबंधित सामग्री का सुरक्षित उपयोग करना जरूरी है।
क्या है घटस्थापना की विधि?
सबसे पहले पूजा स्थल की सफाई कर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। इसके बाद मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं। स्वच्छ कलश में जल भरकर उसमें परंपरा के अनुसार सुपारी, अक्षत और अन्य पूजन सामग्री डाली जाती है। कलश के मुख पर पत्ते और नारियल स्थापित कर उसे पूजा स्थल पर रखा जाता है।
इसके बाद मां दुर्गा का आह्वान, दीप प्रज्वलन, मंत्र जाप और मां शैलपुत्री की आरती की जाती है। श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या अन्य स्तोत्रों का पाठ भी करते हैं।
क्यों मनाई जाती है नवरात्रि?
नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है नौ रातें। हिंदू धर्म में यह पर्व शक्ति की उपासना, बुराई पर अच्छाई की विजय और आत्मशुद्धि का प्रतीक माना जाता है। वर्ष में चैत्र और शारदीय नवरात्रि विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। शारदीय नवरात्रि आश्विन मास में मनाई जाती है और इसके दसवें दिन विजयादशमी यानी दशहरा आता है।
इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है। पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कूष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में नवरात्रि मनाने की परंपराएं भी अलग हैं। महाराष्ट्र में घटस्थापना, देवी पूजा और गरबा-डांडिया के आयोजन होते हैं। गुजरात में गरबा और डांडिया रास विशेष आकर्षण होते हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा भव्य पंडालों और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ मनाई जाती है।
क्या है नवरात्रि के पीछे की पौराणिक कथा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस ने कठोर तपस्या के बाद वरदान प्राप्त किया था और अपनी शक्ति के मद में देवताओं तथा मनुष्यों को परेशान करने लगा था। उसके अत्याचारों से त्रस्त देवताओं ने आदिशक्ति की आराधना की। इसके बाद देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ और उन्होंने महिषासुर के साथ नौ दिनों तक युद्ध किया।
मान्यता है कि दसवें दिन देवी ने महिषासुर का वध कर धर्म और न्याय की स्थापना की। इसी विजय की स्मृति में नवरात्रि और विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। यह कथा संदेश देती है कि अन्याय और अहंकार चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः सत्य और धर्म की विजय होती है।
एक अन्य प्रमुख धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण से युद्ध करने से पहले देवी दुर्गा की आराधना की थी। विजयादशमी को भगवान राम की रावण पर विजय से भी जोड़कर देखा जाता है।
मां शैलपुत्री की उत्पत्ति की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां शैलपुत्री अपने पूर्वजन्म में राजा दक्ष की पुत्री सती थीं। भगवान शिव से विवाह करने के बाद एक यज्ञ में पिता दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने से दुखी होकर सती ने अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री कहलायीं। आगे चलकर उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पुनः प्राप्त किया।
यह कथा भक्ति, संकल्प और आत्मसम्मान का संदेश देती है। नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा के माध्यम से भक्त जीवन में शक्ति, धैर्य और सकारात्मकता की कामना करते हैं।
उपवास और साधना का महत्व
नवरात्रि के दौरान अनेक श्रद्धालु नौ दिनों तक उपवास रखते हैं। कुछ लोग केवल फलाहार करते हैं, जबकि कुछ एक समय सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत रखने का तरीका व्यक्ति की सेहत, पारिवारिक परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकता है। मधुमेह, गर्भावस्था या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को उपवास से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि आत्मसंयम, अनुशासन, सेवा और ध्यान का अवसर है। इन दिनों जरूरतमंदों की सहायता करना, कन्या पूजन, अन्नदान और सकारात्मक आचरण को भी विशेष महत्व दिया जाता है।
नवरात्रि का संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को अपने भीतर की नकारात्मकता, अहंकार और बुराइयों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। मां शैलपुत्री की आराधना के साथ शुरू होने वाला यह पर्व श्रद्धालुओं में नई ऊर्जा, विश्वास और उत्साह का संचार करता है।
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