प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू की पुण्यतिथि आज/ १२ साल तक राष्ट्रपति के रूप में सेवा दी थी, भारत रत्न से हुए थे सम्मानित
देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की पुण्यतिथि आज।
साधारण परिवार में जन्मे तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी जो आज का बिहार है, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद देश के प्रथम राष्ट्रपति रहे।
राजेंद्र बाबू १९५० से १९६२ तक के लंबे कार्यकाल तक राष्ट्रपति रहे। १३ फरवरी १९५२ तक कार्यकारी राष्ट्रपति के रूप में आए, इससे पहले १९५० से वह कार्यकारी राष्ट्रपति रहे। १९५२ के चुनाव में वह राष्ट्रपति बने ,फिर १९५७ के चुनाव में भी बने।
इससे पहले वह केंद्रीय सरकार में १९४७ अगस्त से १९४८ जनवरी तक केंद्रीय खाद्य/कृषि मंत्री रहे।
संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में १९४६ से लेकर १९५० तक वह आसीन थे।
आज के सिवान, बिहार प्रांत में जन्मे राजेंद्र बाबू पिता महादेव सहाय और माता कामेश्वरी देवी की पांच संतानों में सबसे छोटे थे।बहुत छोटे थे तभी माताजी का देहांत हो गया था। पिताजी सहाय ( कायस्थ परिवार) संस्कृत एवं परशियन भाषा के जानकर थे। माता महाभारत और रामायण की बहुत जानकारी रखती थीं। तीन बड़ी बहने रही जिन्होंने राजेंद्र बाबू को पाला पोसा। मूल रूप से इनका परिवार उत्तर प्रदेश के अमोधा के कुआं गांव से संबंधित था। तत्कालीन जन्मस्थल ज़िरदेई के पास छोटी सी रियासत हथुआ की दीवानी राजेंद्र बाबू के दादा जी को मिली थी।वह उस जमाने में भी थोड़ा पढ़ें लिखे थे। यह दीवानी करते हुए थोड़ी जमीन खरीद की और राजेंद्र बाबू के पिता इसी जमीन की जमीदारी भी किए। पांच वर्ष की उम्र में एक मौलवी से राजेंद्र बाबू ने फारसी भी सीखी और बाद में शिक्षा के लिए छपरा चले गए।
प्रारम्भिक शिक्षा बिहार के छपरा में हुई।इसी दौरान महज १२ वर्ष की उम्र में ही विवाह राजवंशी देवी से हुआ।इसके बाद वह और उनके बड़े भाई महेंद्र प्रसाद आगे की शिक्षा के लिए पटना गए।
कलकत्ता विश्वविद्यालय की आरंभिक परीक्षा में प्रथम स्थान में पर राजेंद्र बाबू को ३० रूपये मासिक की छात्रवृत्ति भी मिली। १९०७में कलकत्ता से अर्थशास्त्र में MA फर्स्ट क्लास से किया। मुजफ्फरपुर के लागत सिंह कॉलेज में उन्होंने बतौर प्रोफेसर अंग्रेजी पढ़ाई। तत्कालीन रिपन कॉलेज से लॉ भी किया और इस दौरान वह अध्यापन भी करते रहे।
उन्हें अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, बंगाली ,हिंदी इन सभी भाषाओं पर महत्वपूर्ण ज्ञान रहा। हिंदी अखबार "देश" एवं अंग्रेजी की" पटना लॉ वीकली" का संपादन भी राजेंद्र बाबू ने किया।
इलाहाबाद विश्विद्यालय ने उन्हें डॉक्टर ऑफ लॉ से सम्मानित किया था।
महात्मा गांधी से प्रभावित होकर कांग्रेस ज्वाइन किया और नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया ,ब्रिटिश हुकूमत ने जेल भी भेजा।वह बिहार से प्रमुख नेता के रूप में उभरे थे।
वह आजादी के बाद उसी संविधान सभा के अध्यक्ष बने जिसने संविधान को अंतिम रूप दिया। इनके राष्ट्रपति बनने के बाद संविधान सभा को समाप्त कर दिया गया था।
सेवानिवृत होने के वर्ष भर बाद २८ फरवरी १९६३ को इनका देहांत हो गया। राजेंद्र बाबू कुशल राजनेता, पत्रकार, अधिवक्ता रहे।
१९६२ में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
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