क्रांतिकारी मंगल पांडे पुण्यतिथि पर विशेष
मंगल पांडे पुण्यतिथि ८ अप्रैल १८५७
जन्म बलिया जिला,उत्तर प्रदेश
पेशा: २२ साल की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत की ईस्ट इंडिया कम्पनी में बंगाल में बटालियन के सिपाही की नौकरी।
देश के लिए योगदान: १८५७ में नई बंदूक सिपाहियों को दी गई जिसमे कारतूस को दांत से काट कर खोलना पड़ता और उसमे मौजूद बारूद को बंदूक की नली में भरना होता था। खबर फैल गई कि कारतूस की खोल में गाय और सुअर की चर्बी है।
मंगल ब्राह्मण थे। वह यूपी बलिया के दिवाकर पांडे के यहां जन्मे ।जातिवाद भी चरम पर थी। घर की माली हालत जर्जर थी इसलिए नौकरी जरूरी थी। उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी हमारे ही भारत के युवाओं को सेना में भरती कर हमारे ही लोगों पर जुल्म करती थी।
आर्थिक विपन्नता के चलते मंगल पांडे ने सेना ज्वाइन कर ली ।जब खबर फैली कि नई बंदूक के कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी का इस्तेमाल हुआ है और इस तरह धर्म भ्रष्ट किया जा रहा है तो उन्होंने कारतूस नहीं खोलने का निर्णय लिया।साथी सैनिकों को भी समझाया।
लखनऊ परेड के दौरान कारतूस खोलने के लिए निर्देश दिया गया।मंगल पांडे ने नही खोला, विरोध किया। अधिकारियों ने जिद की तो मंगल पांडे ने स्वयं की जान लेनी चाही , अंत तह उन्हे पकड़ लिया गया और फांसी दे दी गई।मंगल पांडे फांसी चढ़ गए लेकिन कारतूस को दांत से नही खोला।
ब्रिटिश सत्ता को लगा कि विरोधी आवाज दबा दी गई लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
मंगल पांडे का बलिदान एक चिंगारी के रूप में बढ़ा और भीषण विद्रोह का आकार ले लिया।यही विद्रोह पहले स्वतंत्रता संग्राम का आधार बना। आगे चलकर यह आंदोलन इतना व्यापक बना कि अंग्रेजी सत्ता भीतर तक डर चुकी थी।
१८५७ के पहले स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेता मंगल पांडे अमर हो गए।
अमर शहीद मंगल पांडे जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
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