मराठा आरक्षण की लड़ाई बदल सकती है महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरण?
उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीट के बाद महाराष्ट्र देश का दूसरा वह राज्य है जहां 48 सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें हैं।
महाराष्ट्र का राजनयिक समीकरण वैसे भी 2022 में पूरी तरह बदल गया । हालात तो 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद ही बदलने लगे थे। जब शिवसेना ने भाजपा से अपना गठबंधन तोड़ दिया यह कहते हुए कि ढाई: ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद का करार हुआ था जिस पर भाजपा मुकर रही है और इसलिए वह भाजपा के साथ सरकार नहीं बनाएंगे ।
हालांकि जनता का मत भाजपा शिवसेना के गठबंधन को दिया गया था। भाजपा ने जहां एक ओर २३ सीटें ,वहीं शिवसेना ने १८ सीटें जीती थीं।
इस बार ऐसा नहीं लगता इस तरह के आंकड़े आने आसान होंगे।
उद्धव ठाकरे शिवसेना प्रमुख ने कांग्रेस और राकंपा के साथ मिलकर सरकार बनाई जो कभी विपक्ष में हुआ करते थे। लगभग ढाई वर्ष का कार्यकाल पूरा भी किया और इसी बीच उनकी ही कैबिनेट के मिनिस्टर एकनाथ शिंदे ने लगभग 40 विधायकों के साथ अपना समर्थन पत्र बीजेपी को दे दिया और मूल शिवसेना पार्टी से अलग हो गए। चुनाव आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय के काफी उठा पटक के बाद आखिरकार शिवसेना का सिंबल और चुनाव चिन्ह दोनों ही एकनाथ शिंदे समूह को दे दिया गया।
इस कारण शिवसेना में फूट पड़ गई और शिवसेना के दो ग्रुप एक उद्धव ठाकरे समूह और दूसरा एकनाथ शिंदे समूह में विभाजित हो गया । जाहिर सी बात है शिवसेना की शक्ति भी इसी तरह विभाजित हो गई है ।
उल्लेख कर दें कि मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन में एकनाथ शिंदे समूह का वर्चस्व भले ही हो लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में और उपनगरीय इलाकों में उद्धव ठाकरे समूह का जलवा है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
इधर हाल ही में कुछ ही महीने पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार से उनके ही भतीजे और राज्य के उपमुख्यमंत्री रह चुके अजीत पवार ने बगावत कर दी और 30 विधायकों को लेकर उन्होंने पार्टी तोड़ दी।
फिलहाल अजीत पवार खेमे की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में उनके समर्थक 30 विधायक हैं जिन्होंने मौजूद एकनाथ शिंदे समर्थित शिवसेना भाजपा की सरकार को समर्थन देकर सरकार में शामिल हो लिए हैं।
२०१९ में राकांपा को बारामती समेत ४ लोकसभा क्षेत्र में विजय प्राप्त हुई थी।
पुणे के कस्बा में हुए विधानसभा उपचुनाव में हाल ही में कांग्रेस को जीत मिली जो २८ वर्षों से भाजपा के कब्जे में थी, और यह जीत कांग्रेस के कमबैक के रूप में देखी जा रही है।
हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को तीन राज्यों में स्पष्ट बहुमत मिल गया और एक बार फिर देश में भाजपा की ही सत्ता वापसी के संकेत देखने को मिले।
महाराष्ट्र की स्थिति बिल्कुल अलग मोड़ पर है। शिवसेना और राकांपा दोनो ही विभाजित हो चुके हैं और विभाजित पार्टियां भाजपा के साथ मिलकर सरकार में शामिल हैं । जाहिर है, भाजपा का जनाधार बढ़ेगा लेकिन उद्धव समूह का वर्चस्व ग्रामीण क्षेत्रों में है इसलिए भाजपा उन क्षेत्रों से अपने ही उम्मीदवार उतारने का प्रयत्न करेगी।
पर्याप्त वर्षा न होने के चलते फसलें खराब हुई। कांदा, टमाटर व्यापारी एक्सपोर्ट बैन करने, कीमतों में बार बार केंद्र सरकार द्वारा समीक्षा करने से नाराज ही हैं। कई दिनों तक पोर्ट पर कांदा ट्रकों में लादकर सड़ते रहे, यह हम सब देख ही चुके हैं। स्थानीय किसानों, व्यापारी मंडल में गुस्सा इतना फूटा कि राज्य के मंत्रियों को केंद्र सरकार के मंत्रियों को उतारना पड़ा तब जाकर स्थिति नियंत्रण में आई।
दूसरी ओर कांग्रेस, शरद पवार समर्थित राकांपा इस स्थिति को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे जिससे भाजपा को जनमत का नुकसान हो सके।
ओबीसी मोर्चे पर भी मराठा आरक्षण को लेकर नेता मनोज जरंगे पाटिल राज्य सरकार को हर दूसरे दिन नया अल्टीमेटम देते हैं। पाटिल ने मुंबई के आजाद मैदान में आकर आमरण अनशन की बात भी कह दी है।
राज्य सरकार यदि मराठा आरक्षण के मुद्दे पर शांत रहती है तो ओबीसी समाज का मत मिलना तय है क्यों कि ओबीसी समाज मराठा आरक्षण के समर्थन में नहीं हैं, उसके पास पहले से ही आरक्षण के नाम पर कई जातियां है और मराठा समाज को भी इसमें शामिल किया तो उनका ही हिस्सा कम हो जायेगा, यह बात ओबीसी समाज बखूबी जानता है।
बहुजन वंचित आघाड़ी के प्रकाश आंबेडकर को कांग्रेस भी करीब रखना चाहती है और शिवसेना यूबीटी भी।
कुल मिलाकर महाराष्ट्र में २०२४ लोकसभा चुनाव की लड़ाई पहले की अपेक्षा काफी संघर्ष मय है।
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