तीनों क्रिमिनल लॉ बिल राज्य सभा में भी पास, कानून बनने के लिए जाएगा राष्ट्रपति के पास/ तारीख पर तारीख देने का दौर खत्म: गृह मंत्री अमित शाह
संसद की शीतकालीन सत्र में नए संसद भवन में अपराधिक कानून से निहित तीनों विधेयक लोकसभा के साथ ही राज्यसभा से भी पास हो चुके हैं और उन्हें अब कानून बनने हेतु राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की स्वीकृति हस्ताक्षर के बाद यह कानून लागू हो जाएंगे।
लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इन तीनों विधेयको को पेश किया था। शाह ने कहा कि अब वह दौर चला जा जाएगा, जब मामले के निपटारे के लिए तारीख पर तारीख दी जाती थी।
तीनों क्रिमिनल लॉ बिल भारतीय न्याय संहिता ( proposal to replace indian penal code )भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता( proposal to replace code of criminal procedure) , भारतीय साक्ष्य संहिता बिल( indian evidence act) दोनो सदनो में पास हो चुके हैं।
बलात्कार के लिए अब तक धारा 375, 376 थी जो अब बदलकर 63, 69 हो जाएगी।
हत्या की धारा 302 थी, अब वह धारा 101हो जाएगी।
सामूहिक बलात्कार के मामलों में दोषियों को 20 साल तक की सजा या जीवन भर जिंदा रहने तक जेल में रहने की सजा मिलेगी।
मॉब लिंचिंग में दोषी पाया गया तो फांसी की सजा मिलेगी।
अपघात/ एक्सीडेंट से जुड़े मामलों में ...
यदि एक्सीडेंट करनेवाला वाहन चालक घायल को अस्पताल स्वयं लेकर जाता है तो उसे कम सजा दी जाएगी।
हिट एंड रन केस यानी ऐसे मामले जहां एक्सीडेंट करके ड्राइवर भाग जाते हैं, ऐसे दोषियों को 10 साल की सजा मिलेगी।
स्नैचिंग यानी छीनकर भागने वालों के लिए अब तक कोई ठोस कानून नही है, अब कानून बनाया जा रहा है। पर्स, चैन छीनकर भागनेवालो के लिए बुरी खबर है।
मार पीट झगड़े में यदि किसी को लाठी डंडे से सर पर मार लगी और उस घायल व्यक्ति का ब्रेन डेड हुआ तो अभियुक्त को 10 साल की सजा मिलेगी।
अब तक ऐसे मामलों में सामान्य झगड़े की धाराएं ही लगती रही हैं।
मामला पुलिस ट्रायल से ..
यदि किसी मामले में पुलिस ने दोषी को गिरफ्तार किया तो उसके परिवार को यह जानकारी अनिवार्यतः देनी ही होगी, अब तक यह जरूरी नहीं था।
यदि मामला दर्ज हुआ तो 90 दिनो में उस मामले पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की इसकी जानकारी पुलिस द्वारा पीड़ित को देना ही होगा।
किसी मामले में यदि अभियुक्त/ आरोपी मामला दर्ज होने के 90 दिनो के अंदर किसी भी कारण से न्यायालय में पेश नही हो पाता तो उसकी अनुपस्थिति में भी कोर्ट ट्रायल चलेगा।
गंभीर मामलों में आधी सजा काटने के बाद अभियुक्त की रिहाई हो सकती है।
अधिकतम 3 सालों में ट्रायल कोर्ट को मामले में फैसला सुनाना ही होगा।
यदि किसी मामले में सुनवाई पूरी हो चुकी है तो न्यायाधीश को 43 दिनो के अंदर फैसला देना होगा।
फैसला देने के 7 दिनो के अंदर सजा सुनाना अनिवार्य होगा।
पैरवी करने के लिए संस्थाओं का पचड़ा खत्म:
दोषी अभियुक्त की दया याचिका सिर्फ अभियुक्त ही कर सकता है। अब तक दोषियों की दया याचिका के लिए संस्थाएं, एनजीओ आगे आते थे और ये संस्थाएं दया याचिका फाइल करती थीं।
कानून का रूप लेते ही ये तीनों विधेयक १८६० के भारतीय दंड संहिता (IPC) १९७३ के अपराधिक प्रक्रिया संहिता( CrPC), १८७२ के भारतीय साक्ष्य अधिनियम ( evidence Act )की जगह ले लेंगे।
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