शारदीय नवरात्रि का आरंभ आज से/ शक्ति दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना का पर्व
आज २६ सितंबर से शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ हो रहा है । आज घटस्थापना का दिवस है । सुबह 6:28 से 8:01 तक का मुहूर्त कलश स्थापना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार पूरे वर्ष में हिंदू पंचांग के क्रमानुसार 4 बार नवरात्रि आती है ,जिनमें माघ, चैत्र, आषाढ़ और अश्विन इन महीने में नवरात्रि पड़ती है।
अश्विन मास में पडने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहते हैं। नवरात्रि 9 दिनों तक चलने वाला मां दुर्गा की शक्ति उपासना का विशेष पर्व है ।रात्रि जागरण ,भजन ,मंत्र जप, जगराता इत्यादि इस पर्व के कुछ विशेष आकर्षण है। गुजरात के अहमदाबाद, सूरत ,महाराष्ट्र के मुंबई समेत देश के विभिन्न हिस्सों में इस अवसर पर गरबा का भी आयोजन किया जाता है।
कलश स्थापना मुहूर्त:
शारदीय नवरात्रि पर कलश की स्थापना आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को की जाती है. इस बार प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर को पड़ रही है. इसलिए कलश की स्थापना इस दिन शुभ मुहूर्त में की जाएगी. घटस्थापना का सबसे अच्छा समय सुबह 06 बजकर 28 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 01 मिनट तक रहेगा. इसके अलावा, आप अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्थापित कर सकते हैं. प्रतिपदा तिथि पर सुबह 11 बजकर 48 मिनट से लेकर 12 बजकर 36 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा.
कलश स्थापना में ध्यान देने वाली बात है कि कलश का मुंह खुला न रखें, उसे किसी मिट्टी के ढक्कन या अन्य कटोरीनुमा पात्र से ढंक दें और उसमें चावल भर दें, तदुपरांत उस कटोरी में नारियल रख दें। कलश में गोलाकार तरीके से रक्षासूत्र बांध सकते हैं। कटोरी के नीचे यानी कलशके मुंह पर चारो ओर से आम की पत्ती लगा सकते हैं। कलश पर स्वस्तिक यानी शुभ लाभ का चिन्ह लाल रंग से बनाना शुभ है।
कलश स्थापना के समय क्या करें, क्या न करें:
कलश स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करनी चाहिए. नित्य कर्म और स्नान के बाद ही कलश स्थापित करें. शारदीय नवरात्रि पर अगर आप घर में कलश स्थापना करने जा रहे हैं तो सबसे पहले कलश पर स्वास्तिक बनाएं. इस पर एक कलावा बांधें और उसे जल से भर दें. कलश में साबुत सुपारी, फूल, इत्र, अक्षत, पंचरत्न और सिक्का डालना ना भूलें.
इसके बाद पूजा स्थल से अलग एक चौकी पर लाल या सफेद रंग का कपड़ा बिछाएं. इस पर अक्षत से अष्टदल बनाएं और जल से भरे कलश को यहां स्थापित कर दें. इस कलश में शतावरी जड़ी, हलकुंड, कमल गट्टे और चांदी का सिक्का डालें. फिर दीप प्रज्वलित कर इष्ट देवों का ध्यान करें. इसके बाद देवी दुर्गा के मंत्रों का जाप करें. कलश स्थापना के साथ ही मिट्टी के एक बर्तन में ज्वार बोने की परंपरा होती है.
किस दिशा में रखे कलश:
सामान्यतः वैदिक नियमो के अनुसार ईशान्य कोण यानी पूर्व और उत्तर दिशा का मध्य भाग- इसी दिशा में कलश रखा जाना चाहिए, क्यों कि ईशान्य कोण में ही घर मे मंदिर, देवी देवताओं की प्रतिमाएं रखी जाती हैं।
कलश स्थापना से पहले अखंड ज्योति माता देवी की प्रतिमा के सामने रखें। घी का दीपक जलाएं तो सर्वोत्तम है अन्यथा पूजा के लिए उपयुक्त तिल का तेल भी प्रयोग में ले सकते हैं।
भक्त कलश स्थापना के समय ईशान्य दिशा में ही बैठे। देवी की प्रतिमा को लाल कपड़े का आसन जरूर दें और लाल चुनरी जरूर ओढ़ाएं।
देवी शैलपुत्री यह मां दुर्गा का पहला स्वरूप हैं। इनके ध्यान का मंत्र इस प्रकार है:
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
शैलपुत्री से जुड़ी कथा:
शैलपुत्री हिमालय राज की पुत्री हैं और बृषभ यानी बैल पर सवारी करने के कारण इन्हें वृषारूढा भी कहा जाता है।
दाएं हाथ मे त्रिशूल, बाएं में कमल लिए माँ श्वेत वस्त्र में होती हैं। इन्हें सती के नाम से भी जाना जाता है।
कहानी इस प्रकार है-
माता सती दक्ष प्रजापति के यहां जन्म लेती हैं।दक्ष ब्रम्हदेव के मानस पुत्र हैं और उन्हें प्रजापति बनाया जाता है। सती का विवाह दक्ष के नाराजगी के बावजूद भगवान शिव से होता है।
कालांतर में दक्ष, शिव जी को नीचा दिखाना है इसलिए एक यज्ञ का आयोजन करते हैं और सभी देवताओं को आमंत्रित करते हैं । सिर्फ भगवान शिव को न्योता नही दिया जाता।
लक्ष्मी, ब्रम्हाणी समेत कई देवियां अपने पति सहित कैलाश मार्ग से गुजरती हैं और सती से कहती है कि क्या वह नही जा रही हैं, उनके पिता के यहां यज्ञ आयोजन है।
सती,शिव जिसे साथ चलने का हठ करती हैं लेकिन शिव यह समझाते हैं कि बिना निमंत्रण के वहां जाना उचित नही है।इस पर सती का तर्क होता है कि वह हमारे पिता हैं और हमे बिना किसी निमंत्रण के भी वहां शामिल होना चाहिए। आप भले ही दामाद हैं पर मैं तो उनकी बेटी हूँ और जरूर जाऊंगी।
सती यज्ञ स्थल पर जाती हैं, बहने उन्हें कटुवचन कहती हैं। दक्ष भी तिरस्कार की नजर से देखते हैं। सिर्फ मां ही उन्हें गले लगाती हैं।
मानस में भी गोस्वामी जी ने लिखा-
सादर एक मिली महतारी....
जब सती देखती हैं कि सभी देवता उपस्थित हैं ,उनके आसन भी हैं पर भगवान शिव का आसन ही नही हैं। तब वह पछताती हैं कि उन्हें नही आना चाहिए था।
दक्ष पिता से कहा सुनी होने के बाद सती उस यज्ञकुंड में ही जलकर प्राणों का अंत कर देती हैं।इस घटना को जानकर शिव क्रोधित हो उठते हैं और अपने गण वीर भद्र को भेजकर यज्ञ विध्वंस करा देते हैं।वहां उपस्थित कई देवताओं, किन्नरों, नागों आदि को दक्ष समेत मारा जाता है।
सती का शव लेकर शिव तांडव नृत्य करने लगते हैं। इस क्रोध में उनके तीसरे नेत्र के खुलने के भय और इससे सारी सृष्टि के प्रलय होने के डर से देवता भागे भागे विष्णु के पास जाते हैं।
भगवान विष्णु, शिवजी का मोह भंग करने हेतु सती के शव का सुदर्शन चक्र से विछेदन कर देते हैं। शव के कई भाग धरती में जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ की स्थापना होती है।
कालांतर में कथा आगे बढ़ती हैऔर यही सती अगले जन्म में हिमालय राज के यहां जन्म लेती हैं। नवरात्रि का पहला दिन इन्ही देवी को समर्पित है।
आज से शुरू होकर नवरात्रि का यह पर्व ४ अक्टूबर तक चलेगा। ५ अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी।
मुम्बई में भी कई जगहों ,पंडालों पर गणेशउत्सव की तरह ही देवी की मूर्ति स्थापना की जाती है।
गणेशोत्सव और दुर्गापूजा की शुरुआत लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने की थी।
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