महाशिवरात्रि विशेष
भगवान महादेव की महाशिवरात्रि पर शिव मंदिरों में शिवलिंग पर दूध, जल बेलपत्र धतूरा भंग अर्पण कर पूजा की जाती है। रुद्र अभिषेक अत्यंत सुखदाई है।
महामृत्युंजय मंत्र का जप, पंचाक्षर मंत्र( ॐ नमः शिवाय) , शिव चालीसा का पाठ बहुत फलदाई है।
फाल्गुन माह, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन आज यह महापर्व है। सर्वार्थ सिद्धि योग का अद्वितीय संयोग भी है।
महाशिवरात्रि मुहूर्त:
ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 5:21 बजे से 6:12 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:15 बजे से 12:59 बजे तक
निशिता काल – 15 फरवरी की रात 12:11 बजे से 1:02 बजे तक
प्रदोष काल – शाम 6:00 बजे से रात 8:38 बजे तक
चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 15 फरवरी को शाम 5 बजकर 4 मिनट पर होगी और इसका समापन 16 फरवरी को शाम 5 बजकर 34 मिनट पर होगा। निशिता काल और प्रदोष काल को ध्यान में रखते हुए महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा।
चार प्रहर में पूजा के विशेष मुहूर्त:
प्रथम प्रहर – 15 फरवरी, शाम 6:11 से रात 9:23 तक
द्वितीय प्रहर – रात 9:23 से 12:36 तक
तृतीय प्रहर – रात 12:36 से सुबह 3:47 तक
चतुर्थ प्रहर – 16 फरवरी, सुबह 3:47 से 6:59 तक
आज दिन भर उपवास रखकर भगवान शिव की इस विशेष रात्रि में भजन, पूजन, रात्रि जागरण करते हुए आशुतोष के ध्यान में मंत्र जप का फल कई गुना अत्यंत लाभदाई है।
भगवान शिव की आरती कपूर से करें।
कब करें शिवलिंग पर जल अर्पण;
शिव पुराण के अनुसार सुबह में जल अर्पण विशेष लाभदाई है। सूर्यास्त के बाद भी जल अर्पण का विधान है।
पूर्व एवं दक्षिण दिशा में खड़े होकर जल अर्पण नहीं करना चाहिए।
माता पार्वती , भगवान शिव के बाईं ओर विराजती हैं ,इसलिए उत्तर की ओर खड़े होकर जल अर्पण करना अति उत्तम है। दूध, दही, गंगाजल, बेल पत्र, गन्ने के रस आदि का प्रयोग किया जाता है।
कथा विशेष
चित्रभानु ने साहूकार से कर्ज ले रखा था, इसलिए समय पर न चुका पाने से उसे शिवमठ में बंदी बनाया गया। उस दिन शिवरात्रि होने से शिव चर्चा भी सुनी। बाद में इस वचन पर की अगले दिन वह कर्ज चुका देगा,साहूकार ने उसे मुक्त कर दिया।
शिकारी चित्रभानु जंगल में शिकार के समय थक गया, रात बेल के पेड़ पर बिताई। दिन भर भूखे प्यासे होने के नाते थक गया और इस लिए रात इस पेड़ पर बिताई। तीन बार हिरणियों को बिना शिकार के जाने दिया। सुबह हिरणों के पति को भी नहीं मारा।
पहले प्रहर में एक हिरणी आई, जिसे मारने के लिए प्रत्यंचा चढ़ाई तो उसने कहा कि वह गर्भवती है, एक साथ दो जीव की हत्या पाप है।मै प्रसव करके वापस आऊंगी तब मार देना। शिकारी ने छोड़ दिया।
दूसरी हिरणी दूसरे प्रहर में आई, शिकारी को देख बोली वह ऋतु स्नान करके आई है और कामातुर अवस्था में है, वह पति से मिलकर वापस आएगी तब मार देना। इस बार भी शिकारी ने छोड़ दिया। इस प्रहर में भी तीर वापस रखते समय बेल के पत्ते टूटे और शिव लिंग पर गिरे।
तीसरे प्रहर में एक हिरणी फिर आई और उसके साथ उसके बच्चे भी थे।शिकारी मारने चला तो वह बोली कि उन बच्चों को पिता के हवाले कर वह आ जाएगी ,तब मार देना। शिकारी में फिर दया भावना जागी और जाने दिया। इस बार भी बेल पत्र टूटे और शिवलिंग पर गिरे।
सुबह जब पुरुष हिरण आया तो शिकारी मारने के लिए तैयार हो गया।हिरण ने कहा मेरी पत्नियां मुझे ढूंढ रही है।उनसे मिलकर आ जाऊंगा। शिकारी ने पूरी रात की घटना बताई, तो हिरण ने कहा वह तीनों मेरी ही पत्नियां हैं।तुम्हे उन्होंने जो वचन दिया है, वह मेरे मरने पर निभा नहीं पाएंगे इसलिए मेरा जीवित रहना जरूरी है।मै उन सबके साथ तुम्हारे सामने प्रस्तुत होता हूं।
हिरण, तीनों पत्नियां, बच्चे सब कुछ समय बाद शिकारी के सामने प्रस्तुत थे। उनके इतनी ईमानदारी, वचन पालन के कर्तव्य को देखकर ,रात भर अनजाने में हुई शिव पूजन से उसका मन बदल चुका था।उसने सबको जीवन दान दे दिया था।
अनजाने में ही बिल्व पत्र तोड़कर नीचे शिवलिंग पर चढ़ाता रहा। जिसके फलस्वरूप उसे अंत समय में यम न ले जा सके।वह शिव धाम गया।
महाशिवरात्रि क्यों है विशेष?
माता सती द्वारा १० हजार वर्ष तक तपस्या, फिर हिमालय राज के यहां पार्वती के रूप में जन्म, १० दिनों तक तपस्या के बाद भगवान शिव ने विवाह का वर दिया।
आज ही की रात यह विवाह संपन्न हुआ। काशी ही माता की तप स्थली रही है। यहां पूरी नगरी बाराती होती है, धूम धाम से विवाह उत्सव मनाया जाता है।
काशी, वाराणसी में १ लाख से अधिक शिवलिंग हैं।कई घाट हैं, हर घर में शिव धुन सुनाई देती है।
यही माता सती ने १० हजार वर्ष तक तपस्या की थी। यहां कई महान ऋषियों द्वारा स्थापित शिवलिंग हैं।
काशी ,भगवान शिव की त्रिशूल पर बसी है, ऐसी पौराणिक मान्यता है।
आज की रात जगत पिता शिव एवं माता पार्वती का परिणय हुआ, इस लिए यह रात्रि विशेष है।
शिव की आराधना, मंत्र जप, भजन की दृष्टि से पूरी रात के चारों प्रहर विशेष हैं।
पूरी नगरी में ढोल, ताशे, नगाड़े के साथ, घोड़े , घोड़ियां, बग्घी पर सवार होकर काशी के नगरवासी बाराती बनते हैं और धूम धाम से पूरा विवाह उत्सव मनाया जाता है।
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