दाभोलकर हत्याकांड में दो को आजीवन कारावास, तीन हुए बरी
२२ अगस्त २०१३ को हुए सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर ( ६७ वर्षीय)हत्याकांड में पुणे की सत्र न्यायालय ने पांच आरोपियों में से दो सचिन अंडूर ३३ वर्ष एवम शरद कलासकर २८ वर्षीय को उम्र कैद की सजा सुनाई है जबकि तीन अन्य आरोपियों को पर्याप्त सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है।
डॉक्टर वीरेंद्र तावड़े, एडवोकेट संजीव पुनालेकर, विक्रम भावे को छोड़ दिया गया है, इन तीनों पर भी दाभोलकर की हत्या में शामिल होने , षड्यंत्र रचने का आरोप था।
न्यायपालिका ने यह भी माना कि पुणे पुलिस १० साल से ज्यादा समय गुजर जाने के बावजूद हत्याकांड के मास्टरमाइंड को पकड़ नही सकी थी। इतना हीं नहीं, दाभोलकर पर जिस पिस्तौल से गोली चली, उसे भी बरामद नही किया जा सका।
२०१३ ,२२ अगस्त को सुबह सुबह लगभग ७:३० बजे के करीब पुणे के ओंकारेश्वर ब्रिज पर नरेंद्र दाभोलकर सैर कर रहे थे ,जब मोटर साइकिल पर सवार दो अज्ञात हमलावरों ने उन्हे गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी।
अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति से जुड़े दाभोलकर ने सनातन धर्म के कई परंपराओं का खण्डन किया था और उनके कथन से कई लोग आहत हुए थे।
डॉक्टर वीरेंद्र तावड़े,सनातन संस्था का एक सदस्य भी है जिसे दाभोलकर की बातें खटक रही थी और उसने मरने का षड्यंत्र रचा था हालांकि सत्र न्यायालय ने माना कि पुलिस के पास डॉक्टर तावड़े के इस हत्याकांड में शादौत्र रचने से संबंधित पर्याप्त सबूत नहीं हैं, इसलिए उसे छोड़ दिया गया।
अतिरिक्त न्यायाधीश प्रभाकर जाधव के अनुसार, एंडूरे एवम कलस्कर के सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें इस कांड का मास्टर माइंड नही माना जा सकता , इसके पीछे कोई और है जिसे अब तक नही पकड़ा जा सका है।
सीबीआई और पुणे पोलिस को यह आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि मास्टर माइंड को नही पकड़ सकना उनकी नाकामी है या सत्ता में बैठे किसी पावरफुल व्यक्ति की दखल के चलते यह हुआ है।
दाभोलकर हत्याकांड
दाभोलकर की हत्या का मामला पहले पुणे की डेक्कन पुलिस ठाणे में रजिस्टर किया गया और बाद में पुणे पोलिस को स्थानांतरित कर दिया गया ।
९ मई २०१४ को यह मामला मुंबई उच्च न्यायालय ने सीबीआई को सौंपा।२ जून २०१६ को सीबीआई ने अपने तरीके से मामले को रजिस्टर किया और जांच शुरू कर दी। संजीव पुनालेकर मुंबई का वकील है जबकि विक्रम भावे मुंबई से सटे पनवेल का निवासी है और डॉक्टर तावड़े ENT( कान, नाक, घसा) विशेषज्ञ है, जिन्हे इस हत्या के षड्यंत्र का दोषी माना गया।
भावे को २००६ मालेगांव ब्लास्ट मामले में भी गिरफ्तार किया गया था।
डॉक्टर तावड़े हिंदू जनजागृति समिति संस्था से जुड़ा था और दाभोलकर से उसके वैचारिक रूप से और व्यक्तिगत मतभेद भी थे।
भावे ने मोटरबाइक का प्रबंध किया था और शूटर हत्या से १५ दिन पहले से ही दाभोलकर के गतिविधियों पर नजर रख रहे थे।
हत्या के बाद कलसकर वकील पुनलेकर से मुंबई ऑफिस में मिला और वकील ने हत्या के लिए उपयोग में लाए पिस्तौल एवम अन्य सामान को नष्ट करने का सुझाव दिया।
कलस्कर ने ४ पिस्टल खाड़ी में फेंक दिया जबकि पोलिस को कोई पिस्तौल बरामद नही हुई।
डिफेंस लॉयर के अनुसार, दाभोलकर को कही और मारा गया और टेंपो में शव को लाकर ब्रिज पर छोड़ दिया गया था, हत्या ब्रिज पर हुई ही नही थी।
हत्या के आरोपी एंडूरे, कलस्कर ने कोर्ट में अपनी बहनों से यह गवाही दिलवाई कि इस दिन रक्षाबंधन था और एंडुरे, कलस्कर दोनो ही बहनों के यहां राखी बंधवाने गए थे।
कोर्ट ने हालांकि दो अन्य प्रत्यक्ष दर्शी गवाहों पर भरोसा किया।एक झाड़ू मारने वाले स्वीपर पर और दूसरा लोकल निवासी जिन्होंने इन दोनो को दाभोलकर को गोली मारकर भागते हुए देखा था।
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