आज श्रावण मास का अंतिम सोमवार/ आज ही है प्रदोष व्रत भी/ जानिए व्रत से जुड़ी कथा और महात्म्य
सावन के सोमवार बड़े महत्वपूर्ण होते हैं. इस दिन शिवलिंग को जल व बेलपत्र अर्पित करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस दिन विशेष तरह के प्रयोग भी किए जाते हैं. आज सावन का अंतिम सोमवार है और अंतिम सोमवार पर सोम प्रदोष का संयोग भी बन रहा है.भगवान शिव की पूजा के लिए सावन के सोमवार बड़े महत्वपूर्ण होते हैं. इस दिन शिवलिंग को जल व बेलपत्र अर्पित करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस दिन विशेष तरह के प्रयोग भी किए जाते हैं।
आज सावन का अंतिम सोमवार है और अंतिम सोमवार पर सोम प्रदोष का संयोग भी बन रहा है।
आइए आपको इसका मुहूर्त बताते हैं :
प्रदोष व्रत हर महीने की दोनों त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है. सावन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि सोमवार, 28 अगस्त की शाम 06.48 बजे से प्रारंभ होकर मंगलवार, 29 अगस्त को दोपहर 02.47 बजे तक रहेगी. सावन सोमवार की प्रदोष व्रत पूजा प्रदोष काल में करना श्रेष्ठ माना गया है।
प्रातः काल या प्रदोषकाल में स्नान करने के बाद शिव मंदिर जाएं. घर से नंगे पैर जायें तथा घर से ही लोटे में जल भरकर ले जाएं. मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करें, भगवान को साष्टांग करें. वहीं पर खड़े होकर शिव मंत्र का 108 बार जाप करें. दिन में केवल फलाहार करें. शाम भगवान के मंत्रों का फिर जाप करें और उनकी आरती उतारें।
पूजा की समाप्ति पर केवल जलीय आहार ग्रहण करें. अगले दिन पहले अन्न वस्त्र का दान करें तब जाकर व्रत का पारायण करें।
(संकलन: आचार्य अजय मिश्र जी, मुख्य पुजारी :विहिप संचालित समर्थ हनुमान टेकडी सिद्ध पीठ, सायन, मुंबई)
सोम प्रदोष व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था इसलिए वह अपने एक बेटे के साथ लालन-पालन के लिए कोई और आसरा न होने के कारण भिक्षाटन करती थी और भिक्षा मांग कर ही अपना और अपने बेटे का पेट पालती थी ।
एक दिन की बात है जब वह भिक्षा लेकर अपने बेटे के साथ लौट रही थी कि रास्ते में उसे एक घायल अवस्था में बालक मिला। वह उसे अपने घर ले आई और उसे आसरा दिया ।यह बालक विदर्भ का राजकुमार था। विदर्भ के राज्य में शत्रु ने हमला कर दिया था और राजा को परास्त कर दिया था ।उन्हीं से बचकर भागा भागा घायल अवस्था में फिरता हुआ यह राजकुमार इस ब्राह्मणी को मिला था।
कुछ दिन बीते ही थे कि एक गंधर्व कन्या अंशुमती की नजर इस राजकुमार पर पड़ी और वह मोहित हो गई। उसने अपने माता-पिता से राजकुमार को मिलवाया। माता-पिता को भी राजकुमार भा गया ।
एक दिन रात के सपने में भगवान शिव ने गंधर्व कन्या के माता-पिता को आदेश दिया कि राजकुमार के साथ में अपनी पुत्री का विवाह कर दें । माता-पिता ने ठीक उसी तरह आदेश मानकर राजकुमार से अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह कर दिया । तदुपरांत गंधर्वों की शक्ति एवं विधवा ब्राह्मणी की प्रदोष व्रत के सामर्थ्य से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रु को खदेड़ दिया और अपने राज्य को पुनः प्राप्त कर लिया। इस राज्य में राजकुमार शासन करने लगा और इस दौरान उसने इस विधवा ब्राह्मणी के बेटे को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। इसके बाद ब्राह्मणी के दिन फिर गए ।
सोम प्रदोष व्रत करने वाले भक्तों के दिन भगवान शिव इसी तरह फेर दिया करते हैं। विधवा ब्राह्मणी हमेशा सोम प्रदोष व्रत का पूरी तरह से पालन किया करती थी।
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