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एशियाटिक सोसाइटी मुंबई में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा दुर्लभ पांडुलिपियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन सम्पन्न

मुंबई के एशियाटिक सोसायटी में दुर्लभ पांडुलिपियों की विशेष प्रदर्शनी का उद्घाटन,
 अमित शाह बोले—भारत की ज्ञान परंपरा हमारी अमूल्य विरासत।

मुंबई।

 केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने मुंबई स्थित ऐतिहासिक एशियाटिक सोसायटी में भारतीय ज्ञान, संस्कृति और साहित्यिक विरासत से जुड़ी दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की विशेष रूप से तैयार की गई प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने प्राचीन भारतीय ग्रंथों और पांडुलिपियों के संरक्षण, अध्ययन तथा नई पीढ़ी तक उनके ज्ञान को पहुंचाने के महत्व पर जोर दिया।

उक्त अवसर पर सीएम फडणवीस, मंत्री चंद्रकांत पाटिल, मंत्री मंगलप्रभात लोढ़ा, मुंबई भाजपा अध्यक्ष अमित साटम, डीसीएम एकनाथ शिंदे, मंत्री जयकुमार रावल, आमदार एवं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण, पूर्व सांसद विनय सहस्रबुद्धे ( एशियाटिक सोसाइटी अध्यक्ष) , विधायक MLC प्रवीण दरेकर , विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर आदि गणमान्य उपस्थित रहे।

प्रदर्शनी में भारतीय सभ्यता और ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत को दर्शाने वाली चुनिंदा पांडुलिपियों को प्रदर्शित किया गया है। इन पांडुलिपियों के माध्यम से भारत के प्राचीन साहित्य, दर्शन, धर्म, विज्ञान, इतिहास और भाषायी परंपरा की झलक देखने को मिलती है। 

एशियाटिक सोसायटी के संग्रह में संरक्षित ऐतिहासिक दस्तावेज और ग्रंथ शोधकर्ताओं तथा इतिहास एवं संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं।

पांडुलिपियां केवल दस्तावेज नहीं, भारत की स्मृति : शाह

उद्घाटन अवसर पर अमित शाह ने भारतीय पांडुलिपियों को देश की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए इनके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा को समझने के लिए मूल पांडुलिपियों का संरक्षण और उनका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण बेहद आवश्यक है।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से दुर्लभ पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जाना चाहिए, ताकि देश-विदेश के शोधकर्ताओं और युवा पीढ़ी को इस अमूल्य विरासत तक पहुंच मिल सके।

एशियाटिक सोसायटी , फोर्ट, मुंबई की ऐतिहासिक भूमिका
मुंबई की एशियाटिक सोसायटी देश की प्रमुख ऐतिहासिक और शोध संस्थाओं में शामिल है। इसकी स्थापना 1804 में हुई थी और पिछले दो शताब्दियों से अधिक समय में इस संस्था ने भारतीय इतिहास, साहित्य, भाषा, पुरातत्व और प्राच्य अध्ययन से जुड़े दुर्लभ दस्तावेजों एवं पुस्तकों का महत्वपूर्ण संग्रह तैयार किया है।

सोसायटी की लाइब्रेरी में मौजूद पांडुलिपियां भारत के अलावा एशिया की व्यापक बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। विशेष प्रदर्शनी के माध्यम से आम लोगों को इस ऐतिहासिक संग्रह को करीब से देखने और भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा को समझने का अवसर मिल रहा है।

युवा पीढ़ी को विरासत से जोड़ने की पहल
प्रदर्शनी का उद्देश्य केवल दुर्लभ पांडुलिपियों को प्रदर्शित करना ही नहीं, बल्कि युवाओं में भारतीय इतिहास और ज्ञान परंपरा के प्रति रुचि पैदा करना भी है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी प्रदर्शनियां भारत की सांस्कृतिक विरासत को संग्रहालयों और अभिलेखागारों से निकालकर आम समाज तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती हैं।

मुंबई में आयोजित यह प्रदर्शनी भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा और आधुनिक संरक्षण प्रयासों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में देखी जा रही है।

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